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डाल झुकीं तरुणी के तन सी

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौरानाया जोगीपहचानेफ़ागुन  , हर गोपी संग दिखते कान्हारात गये नज़दीक जुनहैया,दूर प्रिया इत मन अकुलानासोचे जोगीरा शशिधर आए ,भक्ति - भांग पिये मस्तानाप्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी,लख टेसू न फ़ूला समानाडाल झुकीं तरुणी के तन सी, आम का बाग गया बौरानाजीवन के दो पंथ निराले,कृष्ण की भक्ति अरु प्रिय को पानादौनों ही मस्ती के  पथ हैं  , नित होवे है आना जाना--..!!चैत की लम्बी दोपहरिया में– जीवन भी पलपल अनुमानाछोर मिले न ओर मिले, चिंतित मन किस पथ पे जाना ?
                                    गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”








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